बुधवार, 17 जुलाई 2019

डीएनए



हाइवे पर चलती गाडियाँ
जैसे चलना झूठ है
कहना चाहिए
हाइवे पर दौड़ती गाडियाँ
क्योंकि ‘दौड़ना’ वर्तमान समय का बेरहम सच है
ट्रक, बस, कार, बाइक, स्कूटर, टेम्पो...आदि-आदि
सबको जल्दी है
मसलन ड्राइवर को जल्दी है
कंडेक्टर को जल्दी है
सवारियों को जल्दी है
मालिकों को जल्दी है
सब पहुँचना चाहते हैं जल्द से जल्द अपने गंतव्य तक
सबके काम है बेहद जरूरी
सबके कंधों पर टिका है देश का जनतंत्र ओकता हुआ
इसलिए सब के मन हाइवे पर दौड़ रहे हैं
गाड़ियों की भाँति
ये लो सड़क पर गाय ट्रक से टकरा गई और मर गई
ये लो कुत्ता बस के सामने आया और पिस गया
ये लो बकरी आई और कट गई
ये लो.....................................
इसतरह हाइवे पर लाशें चिपक गईं
इतनी चिपक गईं कि उन्हें पहचानना हो गया नामुमकिन
या यों कह लो लाशें हाइवे ही बन गईं
और लोग हैं कि निरंतर उन पर दौड़ रहे हैं
एक आदमी जो दरअसल एक जीववैज्ञानिक भी है
हाइवे पर छाई चिपचिपी धूल को अपने हाथ पर लेता है
लेब में जाकर करता है डीएनए परीक्षण
परिणाम आता है सामने-
जो दूसरे दिन अख़बार में छपता है
टीवी पर चलता है
सोशल मीडिया पर सरकता है
‘हाइवे पर इनसान के डीएनए मिले’
कितने ?
जितनी गाडियाँ थीं उतने या जनतंत्र में जितने गरीब है उतने
बताना असंभव है
जिस आदमी ने यह शोध किया था
वह अमेरिका में रहता है
फिलहाल अमेरिका इन डीएनए से क्लोन बनाने की रणनीति तैयार कर रहा है
जनतंत्र का क्या कहन है
पत्र लिखे???

नेहा नरूका

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