गुरुवार, 18 जुलाई 2019

आखरी रोटी


                  
सुनती आ रही हूँ उसकी और मेरी माँए एक ही कुँए में डूब के मरी हैं।
कटोरे भर चाय और बासी रोटी का नाश्ता किया था मैंने
इसकी वजह ‘अभाव’ नहीं, ‘लोभ’ थी
स्टील के टिफ़िन में होती थीं कई नरम रोटियाँ
पर उसकी आखरी रोटी जो भाप से तर हो जाती
मेरी ही थाली में सबसे नीचे रखी जाती
चाहे मैं सबसे पहले खाऊँ
मैं हमेशा तीन रोटी खाती थी
चौथी रोटी कब माँगी याद नहीं
ऐसा नहीं कि मिल नहीं सकती थी
पर हक़ीक़त यही थी कि मैं तीन रोटी खाती।

मेरा घर रईसों और इज्जतदारों में गिना जाता था
मेरे लिए रईस और इज्जददार दूल्हा ढूँढा जाता था
और मैं थी कि रहती स्वादिष्ट सब्ज़ी और घी चुपड़ी रोटी की जुगाड़ में


उसकी कहानी मुझसे अलग थी
उसके पास रोटी के नाम पर कुछ जूठे टुकड़े होते
जो मेरे जैसे घरों से बासी होने पर हर शाम उसे मिलते
उसके पास भूख का तांडव था
उसके घर में तीनों समय पड़ता था अकाल, भूखमरी और सूखा


मेरे पास अच्छे कपड़े नहीं थे
उसके पास कपड़े ही नहीं थे
कपड़े के नाम पर थी कुछ उतरन जो मेरे जैसे घरों से हर त्यौहार की सुबह उसे मिलती

मैं अपने दाँत सफ़ेद मंजन से माँजती, मेरे पास ब्रश और पेस्ट नहीं था
वह अपने दाँत कोयले या राख से माँजती, उसके पास मंजन ही नहीं था
उसके दाँत पीले थे और हल्के भी
इसलिए शायद मेरा माँस सफ़ेद था और उसका काला
मुझे बाहर जाने की अनुमति नहीं थी
मेरे पुरखों को डर था कहीं बाहर जाते ही मेरे सफ़ेद माँस पर दाग़ न पड़ जाए
मेरे पुरखों का मानना था सफ़ेद चीज़ जल्दी गंदी होती है
इसलिए मैं भीतर ही रखी जाती
जल्दी ही मेरा सफ़ेद माँस पीला पड़ गया
मेरे पीलेपन को मेरा गोरापन कहा जाता
और मेरी गिनती सुंदर लड़कियों में की जाती
और उसकी बदसूरत लड़कियों में
मेरे घर के नैतिक पुरुष जंगल, खेत, सड़क... पर जाकर उसका बलात्कार करते
और रसोई, स्नानघर, छत... पर मेरा


उसका घर हर साल बाढ़ में बह जाता
और मेरा घर उसी जगह पर हिमालय की तरह डटा रहता
मेरे घर के किवाड़ भारी थे,पत्थर मिला था उनमें
और उसके घर के हल्के, इतने हल्के की हवा से ही टूट जाते
न मैं उसके घर जा सकती थी, न वह मेरे
वह सोचती थी मैं खुश हूँ
और मैं सोचती वह तो मुझसे भी ज्यादा दुखी है।


बस एक ही समानता थी
हम अपने-अपने घरों की आखिरी रोटी खाते थे।
अगर हमारी भूतनियाँ माँए जीवित होती
तो ये आखिरी रोटियाँ वे खा रही होतीं।  

नेहा नरूका


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