तवे पर एक रोटी डालती
दूसरी चकले पर बेलती
तीसरी चूल्हे में सेंकती
ध्यान रखती कहीं रोटी में पड़
न जाए
काला निशान
नहीं वे डाँटेंगे
फेंक देगे थाली ऊल्टी चौके
में
गुस्से से बिलबिलाकर चले
जाएँगे बाहर
रहेंगे रातभर भूखे
उनकी भूखी आँतों के साथ
चारपाई पर औंधे लेटकर
दुस्वार हो जाएगी मेरी एक-एक
साँस
रातभर की नींद
इसलिए मैं उस समय सिर्फ़ एक
चीज़ सोचती
रोटी!
रोटी!!
रोटी!!!
गुसलख़ाने में घुसती
तो देह का मैल छुड़ाते हूए
कॉलर और पेंट की मोहरी को भी
रगड़ती रहती ब्रश से लगातार
अगर एक भी दाग रह गया तो वे
पहनेंगे नहीं
पटककर वहीं ज़मीन पर
चले जाएगे गुस्से से दनदनाते
इसलिए मैं उस वक्त
बस एक ही शब्द याद रखती
सफ़ाई!
सफ़ाई!!
सफ़ाई!!!
सुबह मुँह छिपाकर अंधेरे
खेत की मेढ़ पर
चलती कम सोचती ज्यादा
जैसे बस वही एक सोचने का वक्त
था मेरा
तब मैं खेत, मेढ़, नदी, नाला, नहर
सब पार कर
पहुँच जाना चाहती उस ऊँचे
पहाड़ पर
जहाँ रसोई और गुसलख़ाने के
सिवाए
कुछ और भी दिखे
जैसे-जैसे अंधेरा छटता
मुझे लौटना होता
मेढ़ की घास को अपने हाथों से
छू
उस भोर के उजाले में
मैं ढूँढ़ती कोई तिनका
मैं जानती थी कि तिनका पूरी
जान लगाकर भी
नहीं पहुँचा पाएगा मुझे उस पार
फिर भी मैं ढूँढ़ती
क्योकि मेंने बचपन में
अपने मास्टरजी से सुन रखा था
कि डूबते को तिनके का सहारा
ही बहुत है
फिर एक दिन मुझे एक तिनका
मिला
अब मैं रोटी जला देती हूँ
कॉलर और मोहरी पर
छोड़ देती हूँ लगा मैल
गालियों और गुस्से का मुझपर
जैसे
कुछ असर ही नहीं
होता।
नेहा नरूका
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