बुधवार, 4 सितंबर 2019

मर्द बदलने वाली लड़की

मैं उन लड़कियों में से नहीं
जो अपने जीवन की शुरूआत
किसी एक मर्द से करती है
और उस मर्द के छोड़ जाने को
जीवन का अंत समझ लेती हैं
मैं उन तमाम सती-सावित्रीनुमा
लड़कियों में से तो बिल्कुल नहीं हूं

मैंने अपने यौवन के शुरूआत से ही
उम्र के अलग-अलग पड़ावों पर
अलग-अलग मानसिकता के
पुरुष मित्र बनाए और छोड़े हैं
हरेक मित्र के साथ
मैंने बड़ी शिद्दत से निभाई है दोस्ती

यहां तक कि कोई मुझे उन क्षणों में देखता
तो समझ सकता था
राधा, अनारकली और हीर-सी कोई रूमानी प्रेमिका

इस बात को स्वीकार करने में मुझे
न तो किसी तरह की लाज है
न झिझक
बेशक कोई परंपरारावादी मुझे कह दे
छिनाल, त्रिया चरित्र या कुलटा वगैरह-वगैरह

चूंकि मैं मर्द बदलने वाली लड़की हूं
इसलिए तथाकथित सभ्य समाज के खांचे में
लगातार मिसफिट होती रही हूं
पतिव्रता टाइप लड़कियां या पत्नीव्रता लड़के
दोनों ही मान लेते हैं मुझे ‘आउटसाइडर’
पर मुझे इन सब की जरा भी परवाह नहीं
क्योंकि मैं उन लड़कियों में से नहीं
आलोचना और उलहाने सुनते ही
जिनके हाथ-पैर कांपने लगते हैं
बहने लगते हैं हजारों मन टेसूए
जो क्रोध को पी जाती हैं
प्रताड़ना को सह लेती हैं
और फिर भटकती हैं इधर-उधर
अबला बनकर धरती पर

चूंकि मैं मर्द बदलने वाली लड़की हूं
इसलिए मैंने वह सब देखा है
जो सिर्फ लड़कियों को सहेली बनाकर
कभी नहीं देख-जान पाती
मैंने औरत व मर्द दोनों से दोस्ती की
इस बात पर मुझे थोड़ा गुमान भी है
गाहे-बगाहे मैं खुद ही ढिंढोरा पिटवा लेती हूं
कि यह है ‘मर्द बदलने वाली लड़की’
यह लंबा चैड़ा वाक्य
अब मेरा उपनाम-सा हो गया है।

नेहा नरूका

बावरी लड़की

एक लड़की बावरी हो गयी है
बैठी-बैठी ललराती है
नाखूनों से
बालों से...,
भिड़ती रहती है
भीतर ही भीतर
किसी प्रेत से

चाकू की उलटी-तिरछी रेखाएं हैं
उसके माथे पर
नाक पर
वक्ष और जंघाओं पर
उभरे हैं पतली रस्सी के निशान

होंठों से चूती हैं
कैरोसीन की बूंदें
फटे वस्त्रों से
जगह-जगह
झाँकते हैं
आदमखोर हिंसा के शिलालेख

सब कहते जा रहे हैं
बाबरी लड़की
जरूर रही होगी
कोई बदचलन
तभी तो
न बाप को फिकर
न मातारी को
सुनी सुनाई
पते की बात है
लड़की घर से
भाग आयी थी



लड़का-लड़की चाहते थे
एक दूसरे को
पर यह स्वीकार न था
गांव की पंचायतों को
सो लड़का, लड़की को एक रात
भगाकर शहर ले आया

बिरादरी क्या कहेगी सोचकर
बाप ने फांसी लगा ली
मातारी कुंडी लगा के पंचायत में
खूब रोई
बावरी लड़की पर

पटरियों...ढेलों से होती हुई
लड़की मोहल्लों में आ गई
रोटी मांग मांग कर पेट भरती
ऐसे ही गर्भ मिल गया
बिन मांगी भीख में
बड़ा पेट लिए गली-गली फिरती
ईंट कुतरती

एक इज्जतदार से यह देखा न गया
एक ही घंटे  में पेट उसने
खून बनाकर बहा दिया
और छोड़ आया शहर से दूर
गंदे नालों पर
कचरा होता था जहाँ
सारे शहर का
कारखानों का
पाखनों  का
बावरी लड़की कचरा ही तो थी
सभ्य शहर के लिए
जिसमें घिन ही घिन थी

नाक छिनक ली
किस्सा सुनकर महाशयों ने
मालिकों-चापलूसों  ने
पंडितों-पुरोहितों ने
और अपने अपने घरों में घुस गये
बाहर गली में
बावरी लड़की पर कुछ लड़के
पत्थर फेंक रहे हैं
‘कहाँ से आ गयी यह गंदगी यहाँ’
हो.. हो.. हो.. हो...
बच्चे मनोरंजन कर रहे हैं
जवान  और  बूढ़े भी

खिड़कियां और रोशनदान बंद  कर

कुलीन घरों की लड़कियां
वापस अपने काम में जुट गईं

‘अरे भगाओ इसे-
जब तक यह...
यहां अड़ी बैठी रहेगी
तमाशा होता रहेगा’
एक अधेड़ सज्जन ने कहा..
पौधों में पानी दे रही उनकी बीबी
नाक-भौं सिकोड़ने लगी
‘कौन भगाए इस अभागिन को’

लड़की बावरी
खुद ही को देख देख के
हँस रही है
खुद ही को देख देख के
रोती है
सेकेंड दो सेकेंड
चेहेर के भाव बदलते हैं
गला फाड़ कर पसर जाती है
गली में ही
जानवरों की तरह
बावरी लड़की...

नेहा नरूका

चोर

उसे लगता है
वह एक चोर है
जो रहती है हरदम
एक एक नई चोरी की फिराक में
जब भी वह अपने शरीर को गहने
फैशन-एसेसरीज से सजाती है
मेकअप में लिपे-पुते होंठ
आंख, गाल, माथा और नाखून
उसे बेमतलब ही
चोर नजर आते हैं
उसे लगता है
वह छिपाए फिरती है
इन सब में
‘कुछ’

उसे लगता है
घर में
कालोनी में
शहर में हर कहीं
सभी उसके पीछे पड़े हैं
क्या वाकई वह कोई चोरी कर रही है
उसे तो अमूमन यही लगता है
कि उसका भाई जो उसे टोकता है
पड़ोसी जो उसे देखता है
मां जो उसे डांटती है
बहन जो उसे घूरती है
ये सब उसे चोर समझते हैं

उसके पर्स में
किताब में ...
जो रखा है
उसकी डायरी में जो लिखा है
उसमें मन में जो घूमता है
यह सब चोरी का सामान
कहीं  कोई  देख  न ले
पढ़  और समझ न  ले

उसे लगता है
समाज की मान्यताओं को नकार कर
लगातार चोरी कर रही है
और ...
सजा से बचने के लिए
कभी-कभी वफादारी का दिखावा कर लेती है
फिर भी उसे महसूस होता है
आज नहीं कल ये सब लोग
कोई न कोई सजा तय करेंगे उसके लिए

नहीं वह नहीं जिएगी
तयशुदा घेरे में बंधकर
चोर की अपनी सीमा होती है
वह सोचती है
उसे तो ‘बागी’ होना पड़ेगा।

नेेहा नरूका

नाच



नाच  तू  बावरी,
नाच,
आज सुहागरात!
कदमों को थिरका
नाच,
ता था थैया.......
मुख से कह कि मुस्कराए
नैन से कह कि मटके
हया को कह ‘चल भाग’
घुघंरू से कह
छम छम छम बजें  रातभर

परदेश से
पिया आंगन में पधारा है
उसने आदेश भिजवाया है

कोठरी  में जाकर
मांग काढ़
सींक से सिंदूर भर

पूर दे...
केशों के बीच
एक सीधी लकीर
जितना दूर तक पूरेगी
उतनी लंबी होगी पिया की उमर

कोहनी तक हाथ भरके
चूड़ी पहन
कर
खन खन खन
नाक में नथ पहन,
गले में हार डाल,
कमर में करधनी बाँध

पैर व हाथ की अँगुलियों में
कस ले बिछुए-अँगूठी

पलंग पर सफ़ेद चादर बिछा
रात में जब पिया
कौमार्य भंग करेगा तेरा
चादर पर लाल धब्बा पड़ेगा
तू चीखना मत गवाँर
कदम, नैन,  घूंघरू, चूड़ी,  नख, होंठ
सबको कह देना
चुप्प!
बाहर आँगन में सो रहे
सास-ससुर जाग जाएँगे
वे जाग गए तो
लाल धब्बे पिया की आंखों में
समा जाएँगे

उन्हें लेकर पिया
चला जाएगा परदेश
और फिर तू रह जाएगी कोरी
इसलिए तू नाच बावरी
तुझे संतुष्ट करना है पिया को
देर मतकर
नाच!!!

नेहा नरूका

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

कविता और गणित के बीच में

मुझे एक ख़ूबसूरत कविता बटे बदसूरत ज़िंदगी या एक बदसूरत कविता बटे ख़ूबसूरत ज़िंदगी में से
किसी एक को चुनना था
मैं कलाकार थी तो मैंने खूबसूरत कविता लिखना वरदान समझा
मैंने समझा मैं कोई महान कवि हूँ
इस तरह एक कविता के लिए मैंने अपना जीवन दाँव पर लगा दिया
मेरे हमउम्र समुद्र के खारे पानी का आनंद ले रहे थे
और मैं भर रही थी उस वक्त आँख में नमक
वे अपने-अपने बच्चों को चूम रहे थे
मुझे बच्चों की किलकारी में भविष्य का रुदन सुनाई दे रहा था
वे सुबह की धूप में योग कर रहे थे
मैं देख रही थी सूरज में दोपहर की आग
मुझे सपने भी आने लगे
रंगहीन-गंधहीन-भंगुर
खूबसूरत कविता के सुख से
कहीं ज्यादा कष्टकर था
इस बदसूरत ज़िंदगी को जीना
दर्शन में मैं होशियार थी
व्याकरण में औसत
पर गणित में मैं बहुत बेकार सिद्ध हो चुकी थी।

 नेहा नरूका

सोमवार, 22 जुलाई 2019

गाजर घास

बीस-इक्कीस साल पहले जब मैं अपने अईया-बाबा के यहाँ जाती थी तो मुझे उस छोटे-से कस्बे पोरसा (मुरैना जिले की एक तहसील) में कहीं-कहीं गाजर घास के दर्शन होते थे।जब मैं किसी बड़े से इसके बारे में पूछती तो मुझे बताया जाता, यह एक जहरीली विदेशी घास है, इसे छूना मत, नहीं तो खुजली हो जाएगी।
                               आज यह घास हर जगह दिखाई देती है, गाँव-खेत-शहर-पार्क कुछ भी नहीं बचा इसके प्रकोप से।गाजर की पत्तियों की तरह दिखने वाली यह वनस्पति, कम्पोजिटी कुल की मानी जाती है जिसे वनस्पति जगत में पार्थेनियम हिस्टोफोरस नाम से जाना जाता है। यह वनस्पति विश्व की सर्वाधिक हानिकारक वनस्पतियो में से एक है और यह मानव और जानवरों के स्वास्थ्य के साथ-साथ आज सम्पूर्ण पर्यावरण के लिए खतरा बन गयी है।
भारत में इस वनस्पति के बीज (कृषि मंत्रालय और भारतीय वन संरक्षण संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार) 1950 में अमरीकी संकर गेंहू पी एल 480 के साथ आए और सर्वप्रथम इसके पौधे को पूना में देखा गया।आज यह घास भारत के अधिकतर प्रदेशों में अपने पैर पसार चुकी है उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र आदि राज्यों की हजारों एकड़ ज़मीन पर यह घास है।
गाजर घास का पौधा आकार में तीन से चार फुट का होता है इसके फूल सफ़ेद रंग के होते है जो जल्दी आ जाते है और 4-6 महीने तक रहते है फूलो के अंदर वजन में हल्के काले रंग के बीज होते है जिनका परागकण वायु द्वारा आसानी से एक जगह से दूसरी जगह हो जाता है और अनुकूल परिस्थितियाँ प्राप्त कर आसानी-सी अंकुरित हो जाते है।गाजर घास की प्रजनन क्षमता अत्यधिक होती है इसके एक पौधे से लगभग 650 अनुकरण योग्य बीज प्राप्त होते है यह वनस्पति जिस स्थान पर एक बार उग जाती है वहाँ आस-पास अन्य वनस्पतियों को उगने नहीं देती।जिसके कारण आज चरागाहों और अन्य वनस्पतियों के नष्ट होने की सम्भावना पैदा हो गयी है।इसकी जड़ों से रासायनिक पदार्थ स्रावित होता है जो भूमि प्रदुषण करता है तथा
परागकणों की संख्या अधिक होने के कारण यह वायु प्रदुषण भी करता है।इसकी पत्तियों से पार्थेनम नामक रासायनिक पदार्थ स्रावित होता है जिससे इसके संपर्क में आने वाले मनुष्यों में एलर्जी, दमा और त्वचा संबंधी रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
           

                                                                                                वैशाली शारदा

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

आखरी रोटी


                  
सुनती आ रही हूँ उसकी और मेरी माँए एक ही कुँए में डूब के मरी हैं।
कटोरे भर चाय और बासी रोटी का नाश्ता किया था मैंने
इसकी वजह ‘अभाव’ नहीं, ‘लोभ’ थी
स्टील के टिफ़िन में होती थीं कई नरम रोटियाँ
पर उसकी आखरी रोटी जो भाप से तर हो जाती
मेरी ही थाली में सबसे नीचे रखी जाती
चाहे मैं सबसे पहले खाऊँ
मैं हमेशा तीन रोटी खाती थी
चौथी रोटी कब माँगी याद नहीं
ऐसा नहीं कि मिल नहीं सकती थी
पर हक़ीक़त यही थी कि मैं तीन रोटी खाती।

मेरा घर रईसों और इज्जतदारों में गिना जाता था
मेरे लिए रईस और इज्जददार दूल्हा ढूँढा जाता था
और मैं थी कि रहती स्वादिष्ट सब्ज़ी और घी चुपड़ी रोटी की जुगाड़ में


उसकी कहानी मुझसे अलग थी
उसके पास रोटी के नाम पर कुछ जूठे टुकड़े होते
जो मेरे जैसे घरों से बासी होने पर हर शाम उसे मिलते
उसके पास भूख का तांडव था
उसके घर में तीनों समय पड़ता था अकाल, भूखमरी और सूखा


मेरे पास अच्छे कपड़े नहीं थे
उसके पास कपड़े ही नहीं थे
कपड़े के नाम पर थी कुछ उतरन जो मेरे जैसे घरों से हर त्यौहार की सुबह उसे मिलती

मैं अपने दाँत सफ़ेद मंजन से माँजती, मेरे पास ब्रश और पेस्ट नहीं था
वह अपने दाँत कोयले या राख से माँजती, उसके पास मंजन ही नहीं था
उसके दाँत पीले थे और हल्के भी
इसलिए शायद मेरा माँस सफ़ेद था और उसका काला
मुझे बाहर जाने की अनुमति नहीं थी
मेरे पुरखों को डर था कहीं बाहर जाते ही मेरे सफ़ेद माँस पर दाग़ न पड़ जाए
मेरे पुरखों का मानना था सफ़ेद चीज़ जल्दी गंदी होती है
इसलिए मैं भीतर ही रखी जाती
जल्दी ही मेरा सफ़ेद माँस पीला पड़ गया
मेरे पीलेपन को मेरा गोरापन कहा जाता
और मेरी गिनती सुंदर लड़कियों में की जाती
और उसकी बदसूरत लड़कियों में
मेरे घर के नैतिक पुरुष जंगल, खेत, सड़क... पर जाकर उसका बलात्कार करते
और रसोई, स्नानघर, छत... पर मेरा


उसका घर हर साल बाढ़ में बह जाता
और मेरा घर उसी जगह पर हिमालय की तरह डटा रहता
मेरे घर के किवाड़ भारी थे,पत्थर मिला था उनमें
और उसके घर के हल्के, इतने हल्के की हवा से ही टूट जाते
न मैं उसके घर जा सकती थी, न वह मेरे
वह सोचती थी मैं खुश हूँ
और मैं सोचती वह तो मुझसे भी ज्यादा दुखी है।


बस एक ही समानता थी
हम अपने-अपने घरों की आखिरी रोटी खाते थे।
अगर हमारी भूतनियाँ माँए जीवित होती
तो ये आखिरी रोटियाँ वे खा रही होतीं।  

नेहा नरूका


तिनका



तवे पर एक रोटी डालती
दूसरी चकले पर बेलती
तीसरी चूल्हे में सेंकती
ध्यान रखती कहीं रोटी में पड़ न जाए
काला निशान
नहीं वे डाँटेंगे
फेंक देगे थाली ऊल्टी चौके में
गुस्से से बिलबिलाकर चले जाएँगे बाहर
रहेंगे रातभर भूखे
उनकी भूखी आँतों के साथ
चारपाई पर औंधे लेटकर
दुस्वार हो जाएगी मेरी एक-एक साँस
रातभर की नींद
इसलिए मैं उस समय सिर्फ़ एक चीज़ सोचती
रोटी!
रोटी!!
रोटी!!!
गुसलख़ाने में घुसती
तो देह का मैल छुड़ाते हूए
कॉलर और पेंट की मोहरी को भी
रगड़ती रहती ब्रश से लगातार
अगर एक भी दाग रह गया तो वे पहनेंगे नहीं
पटककर वहीं ज़मीन पर
चले जाएगे गुस्से से दनदनाते
इसलिए मैं उस वक्त
बस एक ही शब्द याद रखती
सफ़ाई!
सफ़ाई!!
सफ़ाई!!!
सुबह मुँह छिपाकर अंधेरे
खेत की मेढ़ पर
चलती कम सोचती ज्यादा
जैसे बस वही एक सोचने का वक्त था मेरा
तब मैं खेत, मेढ़, नदी, नाला, नहर
सब पार कर
पहुँच जाना चाहती उस ऊँचे पहाड़ पर
जहाँ रसोई और गुसलख़ाने के सिवाए
कुछ और भी दिखे
जैसे-जैसे अंधेरा छटता
मुझे लौटना होता
मेढ़ की घास को अपने हाथों से छू
उस भोर के उजाले में
मैं ढूँढ़ती कोई तिनका
मैं जानती थी कि तिनका पूरी जान लगाकर भी
नहीं पहुँचा पाएगा मुझे उस पार
फिर भी मैं ढूँढ़ती
क्योकि मेंने बचपन में
अपने मास्टरजी से सुन रखा था‌‌‌‌
कि डूबते को तिनके का सहारा ही बहुत है
फिर एक दिन मुझे एक तिनका मिला
अब मैं रोटी जला देती हूँ
कॉलर और मोहरी पर
छोड़ देती हूँ लगा मैल
गालियों और गुस्से का मुझपर जैसे
कुछ असर ही नहीं होता।


नेहा नरूका


बुधवार, 17 जुलाई 2019

डीएनए



हाइवे पर चलती गाडियाँ
जैसे चलना झूठ है
कहना चाहिए
हाइवे पर दौड़ती गाडियाँ
क्योंकि ‘दौड़ना’ वर्तमान समय का बेरहम सच है
ट्रक, बस, कार, बाइक, स्कूटर, टेम्पो...आदि-आदि
सबको जल्दी है
मसलन ड्राइवर को जल्दी है
कंडेक्टर को जल्दी है
सवारियों को जल्दी है
मालिकों को जल्दी है
सब पहुँचना चाहते हैं जल्द से जल्द अपने गंतव्य तक
सबके काम है बेहद जरूरी
सबके कंधों पर टिका है देश का जनतंत्र ओकता हुआ
इसलिए सब के मन हाइवे पर दौड़ रहे हैं
गाड़ियों की भाँति
ये लो सड़क पर गाय ट्रक से टकरा गई और मर गई
ये लो कुत्ता बस के सामने आया और पिस गया
ये लो बकरी आई और कट गई
ये लो.....................................
इसतरह हाइवे पर लाशें चिपक गईं
इतनी चिपक गईं कि उन्हें पहचानना हो गया नामुमकिन
या यों कह लो लाशें हाइवे ही बन गईं
और लोग हैं कि निरंतर उन पर दौड़ रहे हैं
एक आदमी जो दरअसल एक जीववैज्ञानिक भी है
हाइवे पर छाई चिपचिपी धूल को अपने हाथ पर लेता है
लेब में जाकर करता है डीएनए परीक्षण
परिणाम आता है सामने-
जो दूसरे दिन अख़बार में छपता है
टीवी पर चलता है
सोशल मीडिया पर सरकता है
‘हाइवे पर इनसान के डीएनए मिले’
कितने ?
जितनी गाडियाँ थीं उतने या जनतंत्र में जितने गरीब है उतने
बताना असंभव है
जिस आदमी ने यह शोध किया था
वह अमेरिका में रहता है
फिलहाल अमेरिका इन डीएनए से क्लोन बनाने की रणनीति तैयार कर रहा है
जनतंत्र का क्या कहन है
पत्र लिखे???

नेहा नरूका

सफ़ेद रंग की प्रेमिका



1
वह काला था
क्योंकि उसकी माँ ने खाया था काला लोहा
मुझे पसंद था काजल
उससे मिलने के बाद मैंने पहली दफा जाना 
काले रंग की खूबसूरती, आकर्षण और ताकत को
उसकी सोहबत में मेरी बटन आँखे
बैलगाड़ी का पहिया हो गईं
मैंने उनसे देखा
नग्न भारत माता
धरती पर दहाड़ मार कर रो रहीं हैं
उनके लंबे घने काले बाल
ज़मीन पर जंगल बने थे
जंगल के बीच-बीच मे गड्ढे थे जिनमेँ रक्त भरा था
मैंने आँखे बंद कर लीं
क्योंकि वे अक्सर ऐसी तस्वीरें देख लेती थीं जिन्हें देखने के बाद ज़िन्दगी के फ़लसफ़े बदल जाते हैं
मुझे वे सारे रंग याद हैं
जिन्हें पहनकर मैं उससे मिलने जाती थी
उस रात भी मैंने काला रंग पहना था
वह रात भी काली थी
और काली थी वह देह भी
हम थे अदृश्य और मौन
हम दो ही थे उस दिन इस पृथ्वी पर
तीसरा कोई नहीं था
ईश्वर भी नहीं
2
उस रात के बाद सफ़ेद सुबह हुई
मैं उससे बिछड़ गई
और वह मुझसे
मुझे फिर धीरे-धीरे काले रंग के सपने भी आने बंद हो गए
मुझे काला रंग उतना पसंद भी नहीं रहा
पसंद तो मुझे सफ़ेद रंग भी नहीं था
पर यह बात मैंने सबसे छिपाकर रखी
जो रंग चढाओ
वही चढ़ जाता है इसके ऊपर
कोई 'नहीं' नहीं दिखता
'
हाँ हाँ' दिखती है बस
यही बात परेशान कर जाती है इस रंग की मुझे
हाँ ! इसे मिट्टी का सबक़ सिखया जाए
कीचड़ में घुसाया जाए
रोटी-सा तपाया जाए
तो कुछ खासियत बनती है
मेरा रंग भी सफ़ेद है
फ़क सफ़ेद
3
पिछले दिनों वह मुझे फिरसे मिला
जैसे वैज्ञानिक को मिल गया हो वह सूत्र जो दिमाग़ की नसों में कहीं खोया था सालों से
उसे केसरिया रंग पसंद है
मुझे भी पसंद है यह रंग लेकिन रंग की तरह ही
मेरे नए जूते इसी रंग के हैं
जिन्हें मैंने अपने हाथों से बनाया है
मेरे पास कुछ मांस था
मैं उससे बना सकती थी कुछ और भी
पर मैंने जूते बनाए
उनकी चंगुल से आजाद करके लाऊँगा इस रंग को
जिन्होंने इसे क़त्लगाह में तब्दील कर दिया
एक दिन इसी रंग को अपने शरीर पर घिस-घिसकर बनाऊँगा आग
और जलाऊँगा उन्हें
जिन्होंने इसका इस्तेमाल
लाश बोने में किया
सिंहासन उगाने में किया
इन्ही सफेद हाथों से मैंने उसे टोका-
सिर्फ़ उन्हीं को जलाना जो सूखे है और सड़ चुके हैं
जिनसे कोई कोंपल फूट नहीं सकती
चाहे कितना भी सूरज डालो
चाहे कितना भी दो पानी
जिनमें बाँकी हो हरापन उन्हें मत जलाना
क्योंकि हरा रंग जलता है तो धुँआ भर जाता है चारों तरफ़
जलाने वाले का दम भी घुटने लगता है और
कभी-कभी तो आग ही बुझ जाती है
इस तरह सूखे भी बच जाते हैं साबुत
मैंने हरा रंग भर लिया है अपने भीतर
मेरे पैरों में हैं केसरिया जूते
मैंने पहन लिया है काला लोहा
मेरी माँ ने गर्भावस्था के दौरान पिया था जिस 'गाय का दूध' उसकी मौत के बाद
एक शहर ही दफ़न हो गया उसके शव के नीचे
उस शहर के प्रेत ने मुझे अभिशाप दिया था
सफ़ेद रंग की प्रेमिका होने का
ये काले केसरिया हरे गंदले रंग
मुक्ति के मंत्र हैं
ये मंत्र मैंने उस औरत से लिखवाए हैं जो सचमुच का काला लोहा खाती है
जिसका शरीर रोटी का तवा है।

नेहा नरूका


मुफ़्त प्रेम

मैंने सुना था
इस दुनिया में कुछ भी मुफ़्त में नहीं मिलता
हर मुफ़्त चीज़ की कीमत
कभी न कभी चुकानी ही होती है
इसलिए मैंने चीज़ें नहीं खरीदीं
मैंने प्रेम किया
बदले में मुझे अधिक प्रेम मिला

प्रेम में इस अधिक की क़ीमत
मुझे ज़िंदगी भर चुकानी पड़ी।

नेहा नरूका

मंटो की कहानी लाइसेंस पर एक कविता


मैं ख़ुद को बेचती नहीं
पर लोग चुपके-चुपके से मुझे खरीद लेते हैं
पहले मैं सड़क के किनारे टाट बिछाकर मोची का काम करती थी
मेरे पास ग्राहक आते
टूटी चप्पलों और गंदे जूतों की मरम्मत करवाने
मैं झुकती तो वे मेरे उभार नाप लेते
बदले में कुछ सिक्के पकड़ाकर
वे मुझे थोड़ा-सा खरीद ले जाते
इसी तरह फल बेचने वाली
कोयला चुनने वाली
फसल काटने वाली
पेट पालने के लिए मेहनत-मज़दूरी करने वाली औरतें भी
थोड़ा-थोड़ा खरीदी जा रही थीं
औरतों का घर से बाहर काम करना अपवाद है
सामान्य नहीं
ज्यादातर औरतें काठ की रानी बनकर घर में काम करती हैं
कभी-कभी पूरा जीवन वे इस भ्रम में गुजार देती हैं कि उनका कोई खरीददार नहीं
जबकि उनकी एक मामूली-सी कीमत (जैसे-रेशमी वस्त्र, आभूषण और कुछ शब्द) शुरूआत से ही तय होती है
कुछ मोम की रानियां हाड़-तोड़ कर काम करती हैं
फिर भी दो वक्त की भरपेट रोटी नहीं जुटा पातीं
वे घर में ही नर्म, स्वादिष्ट और सुन्दर गोश्त की तरह गरमा-गरम परोस दी जाती हैं
ठंडी होकर जमने के बाद निकलती है उनके मुँह से अल्लाह के लिए बद्दुआ

मैंने सार्वजनिक  स्थानोँँ पर पुरुषोँ को बेसुध, बेख़ौफ़, बदन उघाड़े
नींद लेते हुए देखा
मूत्र-शौच-हस्तमैथुन करते हुए देखा
श्रम का आनंद लेते हुए देखा
ठहाका लगाते, गाते और झूमते हुए देखा
पर औरतों को हमेशा इस सुख से वंचित पाया

कुछ स्वाभिमानी औरतें ख़रीद-फरोख़्त के ख़िलाफ़ खड़ी होती हैं
ऐसी औरतों को भी बुद्धिमान लोग टुकड़ों-टुकड़ों में खरीदने की कोशिश करते हैं
नाकामयाबी मिलने पर उन्हें बरबरता के हवाले कर देते हैं
चूल्हे के अविष्कार के साथ ही औरतें कांच की बोतल में बंद कर दी गईं
वे मांस पकाकर बाहर की तरफ झांकी, तो खुद को उन्होंने मांस के लोथड़े के रूप में जाना
जो बोतल में भरे जहरीले रसायनिक द्रव में तैर रहा था
मैंने इस कांच को तोड़कर लंबी यात्रा पर निकलना चाहा
घोड़ा-गाड़ी को उड़ाने के फन में मैं माहिर थी                                                                  
पर मेरी यह यात्रा रद्द कर दी गई
मुझसे कहा गया मेरे पास लाइसेंस नहीं है।



नेहा नरूका






  







 





चच्चा चल बसे



ज़िंदगी के अंतिम मोड़ पर ऐसा क्या हुआ
चच्चा ने छलांग लगा दी कुँए के भीतर
नहीं सोचा अपने बेटे-बेटीयों और नाती-पोतों के बारे में जरा भी
भूल गये पत्नी
कुछ साल पहले
जिसे मौत के मुँह से खींच कर लाए थे चच्चा
कहते हैं सब ठीक था
बस...
बुड़ापे में गड़बड़ा गई थी उनकी मानसिक स्थिति
बहू आग लगा कर मर गई
एक बेटी का पति ब्याह में ही मर गया
एक का कुछ साल बाद
दो पोतियाँ ब्याह होते ही
पेट से हुईं
फिर बारी-बारी से मर गईं
(या मार दी गईं )
और भी न जाने क्या-क्या देख चुके थे चच्चा
पर नहीं हुए थे पागल
वैसे ही चलते थे
वैसे ही खाते थे
वैसे ही बोलते थे
अपनी दबंगई में
रहते थे हरदम
कभी साग
कभी गन्ना
कभी बेर
चच्चा का अपना एक लोक इतिहास था
चर्चे थे असफेर के गाँवों में
पिछले एक-दो सालों से
हर वक्त बरबराते थे
उनकी पोपले मुँह पर लगा रहता था गालियों का अंबार
जिसके पास बैठ जाते
उसे कोई कामधाम न करने देते
पीठ पीछे सब कहते
चच्चा सिधार जाँए स्वर्ग
मालूम नहीं उस वक्त
क्या आया होगा उनके दिमाग में
बस निर्णय लिया
कूद गये
और चल बसे !


नेहा नरूका