बीस-इक्कीस साल पहले जब मैं अपने अईया-बाबा के यहाँ जाती थी तो मुझे उस छोटे-से कस्बे पोरसा (मुरैना जिले की एक तहसील) में कहीं-कहीं गाजर घास के दर्शन होते थे।जब मैं किसी बड़े से इसके बारे में पूछती तो मुझे बताया जाता, यह एक जहरीली विदेशी घास है, इसे छूना मत, नहीं तो खुजली हो जाएगी।
आज यह घास हर जगह दिखाई देती है, गाँव-खेत-शहर-पार्क कुछ भी नहीं बचा इसके प्रकोप से।गाजर की पत्तियों की तरह दिखने वाली यह वनस्पति, कम्पोजिटी कुल की मानी जाती है जिसे वनस्पति जगत में पार्थेनियम हिस्टोफोरस नाम से जाना जाता है। यह वनस्पति विश्व की सर्वाधिक हानिकारक वनस्पतियो में से एक है और यह मानव और जानवरों के स्वास्थ्य के साथ-साथ आज सम्पूर्ण पर्यावरण के लिए खतरा बन गयी है।
भारत में इस वनस्पति के बीज (कृषि मंत्रालय और भारतीय वन संरक्षण संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार) 1950 में अमरीकी संकर गेंहू पी एल 480 के साथ आए और सर्वप्रथम इसके पौधे को पूना में देखा गया।आज यह घास भारत के अधिकतर प्रदेशों में अपने पैर पसार चुकी है उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र आदि राज्यों की हजारों एकड़ ज़मीन पर यह घास है।
गाजर घास का पौधा आकार में तीन से चार फुट का होता है इसके फूल सफ़ेद रंग के होते है जो जल्दी आ जाते है और 4-6 महीने तक रहते है फूलो के अंदर वजन में हल्के काले रंग के बीज होते है जिनका परागकण वायु द्वारा आसानी से एक जगह से दूसरी जगह हो जाता है और अनुकूल परिस्थितियाँ प्राप्त कर आसानी-सी अंकुरित हो जाते है।गाजर घास की प्रजनन क्षमता अत्यधिक होती है इसके एक पौधे से लगभग 650 अनुकरण योग्य बीज प्राप्त होते है यह वनस्पति जिस स्थान पर एक बार उग जाती है वहाँ आस-पास अन्य वनस्पतियों को उगने नहीं देती।जिसके कारण आज चरागाहों और अन्य वनस्पतियों के नष्ट होने की सम्भावना पैदा हो गयी है।इसकी जड़ों से रासायनिक पदार्थ स्रावित होता है जो भूमि प्रदुषण करता है तथा
परागकणों की संख्या अधिक होने के कारण यह वायु प्रदुषण भी करता है।इसकी पत्तियों से पार्थेनम नामक रासायनिक पदार्थ स्रावित होता है जिससे इसके संपर्क में आने वाले मनुष्यों में एलर्जी, दमा और त्वचा संबंधी रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
वैशाली शारदा
आज यह घास हर जगह दिखाई देती है, गाँव-खेत-शहर-पार्क कुछ भी नहीं बचा इसके प्रकोप से।गाजर की पत्तियों की तरह दिखने वाली यह वनस्पति, कम्पोजिटी कुल की मानी जाती है जिसे वनस्पति जगत में पार्थेनियम हिस्टोफोरस नाम से जाना जाता है। यह वनस्पति विश्व की सर्वाधिक हानिकारक वनस्पतियो में से एक है और यह मानव और जानवरों के स्वास्थ्य के साथ-साथ आज सम्पूर्ण पर्यावरण के लिए खतरा बन गयी है।
भारत में इस वनस्पति के बीज (कृषि मंत्रालय और भारतीय वन संरक्षण संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार) 1950 में अमरीकी संकर गेंहू पी एल 480 के साथ आए और सर्वप्रथम इसके पौधे को पूना में देखा गया।आज यह घास भारत के अधिकतर प्रदेशों में अपने पैर पसार चुकी है उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र आदि राज्यों की हजारों एकड़ ज़मीन पर यह घास है।
गाजर घास का पौधा आकार में तीन से चार फुट का होता है इसके फूल सफ़ेद रंग के होते है जो जल्दी आ जाते है और 4-6 महीने तक रहते है फूलो के अंदर वजन में हल्के काले रंग के बीज होते है जिनका परागकण वायु द्वारा आसानी से एक जगह से दूसरी जगह हो जाता है और अनुकूल परिस्थितियाँ प्राप्त कर आसानी-सी अंकुरित हो जाते है।गाजर घास की प्रजनन क्षमता अत्यधिक होती है इसके एक पौधे से लगभग 650 अनुकरण योग्य बीज प्राप्त होते है यह वनस्पति जिस स्थान पर एक बार उग जाती है वहाँ आस-पास अन्य वनस्पतियों को उगने नहीं देती।जिसके कारण आज चरागाहों और अन्य वनस्पतियों के नष्ट होने की सम्भावना पैदा हो गयी है।इसकी जड़ों से रासायनिक पदार्थ स्रावित होता है जो भूमि प्रदुषण करता है तथा
परागकणों की संख्या अधिक होने के कारण यह वायु प्रदुषण भी करता है।इसकी पत्तियों से पार्थेनम नामक रासायनिक पदार्थ स्रावित होता है जिससे इसके संपर्क में आने वाले मनुष्यों में एलर्जी, दमा और त्वचा संबंधी रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
वैशाली शारदा

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें